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पापांकुश एकादशी व्रत 25 अक्टूवर बुधवार को विष्णु जी को समर्पित है ये एकादशी ः पं. जोशी

श्री मुक्तसर साहिब, 23 अक्तूबर ()ः पापांकुश एकादशी हिन्दुओं के लिए महत्वपूर्ण एकादशी है। यह दिन ब्रह्मांड के रक्षक विष्णु जी को समर्पित है। विष्णु जी के हर रूप की पूजा-अर्चना इस दिन की जाती है। इस दिन व्रत रखने से पापों से छुटकारा मिलता है और स्वर्ग का रास्ता खुलता है। कहते है हजारों अश्व मेघ यज्ञ और सैकड़ों सूर्य यज्ञ करने के बाद भी, इस व्रत का 16 वांभाग जितना फल भी नहीं मिलता है।ये जानकारी सनातन धर्म प्रचारक प्रसिद्ध विद्वान ब्रह्मऋषि पं. पूरन चंद्र जोशी ने गांधी नगर में नवरात्र उत्सव पर चल रहे कार्यक्रम के दौरान पापांकुश एकादशी व्रत पर प्रकाश डालते हुए दी।उन्होंने बताया कि मान्यता है कि कोई भी व्रत इस व्रत के आगे सर्वोच्च नहीं है। जो कोई इस व्रत के दौरान रात्रि को जागरण करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, इस व्रत का फल उस इन्सान के आने वाली 10 पीढियों को भी मिलता जाता है। अश्विन महीने की शुक्ल पक्ष के ग्यारवें दिन पापांकुश एकादशी मनाई जाती है। इस बार में यह एकादशी बुधवार 25 अक्टूबर को है। जो इस पापांकुश एकादशी का व्रत रखता है, उसे अच्छा स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य मिलता है। विष्णु जी को मानने वालों के लिए, इस एकादशी का विशेष महत्व होता है। रीती रिवाजों के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले कृष्ण एवं राधा की पूजा अर्चना करते है। इस एकादशी के बारे में ‘ महाराज युधिष्ठिर, भगवान् श्री- कृष्ण से इस व्रत के बारे में पूछते है। तब भगवान श्री-कृष्ण बताते है कि हजारों साल की तपस्या से जो फल नहीं मिलता, वो फल इस व्रत से मिल जाता है। इससे अनजाने में किये मनुष्य के पाप क्षमा होते है, और उसे मुक्ति मिलती है। श्री-कृष्ण जी बताते है कि इस दिन दान का विशेष महत्व होता है. मनुष्य अगर अपनी इच्छा से अनाज, जूते-चप्पल, छाता, कपड़े, पशु, सोना का दान करता है, तो इस व्रत का फल उसे पूर्णतः मिलता है। उसे सांसारिक जीवन में सुख शांति, ऐश्वर्य, धन-दौलत, अच्छा परिवार मिलता है। श्री-कृष्ण जी ये भी बोलते है कि इस व्रत से मरने के बाद नरक में जाकर यमराज का मुहं तक देखना नहीं पड़ता है, बल्कि सीधे स्वर्ग का रास्ता खुलता है। एक बहुत ही क्रूर शिकारी क्रोधना, विंध्याचल पर्वत में रहा करता था। उसने अपने पूरे जीवन में सिर्फ दुष्टता से भरे कार्य किये थे। उसकी ज़िन्दगी के अंतिम दिनों में, यमराज अपने एक दूत को उस शिकारी को लाने के लिए भेजते है। क्रोधना मौत से बहुत डरता था, वो अंगारा नाम के एक ऋषि के पास जाता है और उनसे मदद की गुहार करता है। वो ऋषिमुनि उसे पापांकुश एकादशी के बारे में बताते है, उसे बोलते है कि आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत वो रखे और उस दिन भगवान् विष्णु की आराधना करे। क्रोधना पापांकुश एकादशी व्रत को पूरी लगन, विधि विधान के साथ रखता है। इस व्रत के बाद उसके पाप क्षमा हो जाते है, और उसे मुक्ति मिल जाती है। इस पापांकुश एकादशी का व्रत दशमी के दिन से ही शूरु हो जाता है। दशमी के दिन एक समय सूर्यास्त होने से पहले सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए, फिर इस व्रत को अगले दिन एकादशी समाप्त होने तक रखा जाता है। दशमी के दिन गेंहूँ, उरद, मूंग, चना, जौ, चावल एवं मसूर का सेवन नहीं करना चाहिए।
पं. जोशी के अनुसार इस एकादशी के दिन भक्त लोग कठिन उपवास रखते है, कई लोग मौन व्रत भी रखते है। जो इस व्रत को रखते है, वे जल्दी उठकर नहा धोकर साफ कपड़े पहनते है। फिर एक कलश की स्थापना कर उसके पास विष्णु की फोटो रखनी चाहिए। यह व्रत दशमी शाम से शुरू होकर, द्वादशी सुबह तक का होता है. इस दौरान कुछ नहीं खाया जाता है। इस व्रत के दौरान, जो इस व्रत को रखते है, उन्हें सांसारिक बातों से दूर रहना चाहिए. मन को शांत रखना चाइये, कोई भी पाप नहीं करना चाहिए, झूट नहीं बोलना चाहिए. इस व्रत के दौरान कम से कम बोलना चाहिए, ताकि मुंह से गलत बातें न निकले

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